Monday, December 20, 2010

BACHPAN KI ADHURI KAHANI

बात उन दिनों की है जब मैं गाँव से लखनऊ अपने भाई के पास पढने जा रहा था ,जो की बी कॉम कर रहे थे ,और दूसरे भाई जी टीवी  रिपेरिंग की दुकान ठाकुरगंज में चला रहे थे |मेरे गाँव में इंटर कॉलेज है ८ पास करने के बाद मैं पढने में ठीक था इसलिए मेरे भाई चाहते थे मैं भी वहीँ जाकर पढूं | मैं भाइयों में सबसे छोटा हूँ सभी लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं ,हम सब भाइयों की देख - रेख बड़े भाई करते हैं जो पापा जी को जिम्मेदारियों से दूर रखते हैं लेकिन मेरे पापा भी अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी  निभाते हैं |उन्होंने मुझे आशीर्वाद ,प्यार देकर लखनऊ भेजा |मेरे मन में बड़ी उमंग थी लखनऊ देखने और पढने की | प्रवेश परीक्षा के बाद मेरा एडमीशन ऍम डी शुक्ला इंटर कॉलेज में करवा दिया गया था ,मैं स्कूल जाकर मन लगाकर पढाई करने लगा था |भाई साहब चौक में किराये के मकान में रहते थे जो तीन मंजिला था ,तीनो मंजिलों पर किरायेदार ही रहते थे मकान मालिक का घर दूसरे मोहल्ले में था ,वह केवल किराया लेने ही आता था |हम लोग दूसरे तल पर रहते थे जिसमे एक गुप्ता  परिवार रहता था |वह लोग व्यव्हार कुशल और मेहनती थे ,मिस्टर गुप्ता  जिनकी उम्र लगभग ४२ वर्ष थी सोनार की दुकान पर काम करते थे |उनके दो लड़के और एक लड़की थी जो भाइयों में सबसे छोटी एवम सबकी चहेती थी |बड़ा  लड़का एक दुकान पर काम करता था छोटा लड़का जिसकी उम्र २५ वर्ष के आसपास थी पढाई करता था , लड़की अलख  जो काफी शरारती और सुन्दर थी वह आठवीं में पढ़ती थी |मिसेज गुप्ता  का स्वभाव बहुत ही अच्छा था वह एक सफल गृहणी एवम परिवार को एक सूत्र में पिरोने वाली महिला थीं ,वह मुझे मेरे भोलेपन और सीधे स्वभाव के कारण बहुत प्यार करती थीं |
मेरे साथ मेरे चचेरे भाई भी रहते थे जो बी एस सी कर रहे थे | हम सबको खुद ही खाना बनाना पड़ता था जिसमे नमक कम कभी ज्यादा हो जाता था और भाई की डांट सुननी पड़ती थी ,शुरू-शुरू में खाना बनाने में हमको बड़ी परेशानी होती थी माता जी की यद् आ जाती थी |अक्सर मै खिचड़ी ही बना लेता था जोकि सबसे सरल काम था ,कभी-कभी मिसेज गुप्ता  भी मेरी सहायता कर देती थीं और कभी अलख  से थोडा काम करवा देती थीं |
अलख एक हंसमुख ,सुन्दर,शरारती और समझदार लड़की थी वह पढने में भी होशियार थी |कभी - कभी मिसेज गुप्ता  मुझे अपने घर में धारावाहिक देखने  के लिए बुला लेती थीं वह मुझे प्यार से रजनी कहती थीं ,मैं मेन गेट बंद करके देखता कि कहीं भैया न आ जायें और मुझे डांट खानी पड़े क्यूँकि वह चाहते थे की मेरा ध्यान केवल पढाई पर रहे |पता नहीं कब मेरे मन में भी सपने आने लगे मेरे भी दिल में कमल खिलने लगे ,पता नहीं कब मेरे दिल में अलख के प्रति अजीब सा आकर्षण पैदा हो गया था ,अब मुझे धारावाहिक का इंतजार रहता की कब आये और कब हम उनके घर टी वी देखने जाएँ |कई तरह के बहाने बनाकर मैं अलख को अपने घर बुलाना चाहता और अधिक से अधिक मैं उसके सामीप्य  का आनंद उठाना चाहता जो मेरे मन को सुकून देता था | मैं मन ही मन उसे चाहने लगा था उसे देखते ही मेरे मन में पटाखे छूटने लगते पर कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता डर था कहीं उसे बुरा न लग जाये और मेरे भाइयों को पाता न चल जाये |जैसे - जैसे समय बीतता गया   मुझे महसूस होने लगा की उसके दिल में भी मेरे प्रति कुछ बेचैनी अवश्य है कहीं न कहीं वह भी मेरा इंतजार करती थी |वह भी अक्सर किसी बहाने मेरे पास आना चाहती थी ऐसा मुझे महसूस होने लगा था |हम लोग एक दूसरे को समझने के बावजूद कभी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए शायद वह भी मेरी तरह अपने घरवालों  से डरती थी |हम दोनों ने कभी एक दूसरे से कुछ भी बोला नहीं पर तडप जरुर महसूस करते  थे |मैं लगभग हर महीने के अंत में गाँव जाता था पर जबसे उससे नजदीकियां बढ़ी गाँव आने का मन नहीं करता था ,आता भी था तो मुश्किल से १-२ दिन ही रुकता |धीरे-धीरे हम एक दूसरे को बहुत चाहने लगे थे पर कभी कह न सके |
उसके स्कूल में वार्षिकोत्सव था जिसमे उसे नाचना था तथा झांकी में सरस्वती का रोल करना था ,उसने मुझे दो दिन पहले ही शाम के समय चुपके से कार्यक्रम में आने का आग्रह किया |मेरा मन सागर की भांति हिलोरे लेता बेसब्री से उस दिन का इंतजार कर रहा था  |मेरा मन ये सोच कर खुश हुआ जा रहा था कि आज मुझे उससे अकेले में घंटो बात करने ,देखने को मिलेगा |आखिर  वह रात आ ही गयी मैं सुबह ३ बजे ही जग गया था न पढने में मन लग रहा था और न नींद ही आ रही थी |उसके भी घर में जल्दी से उजाला हुवा और वह चहक चहक कर तैयार हो रही थी ,वह स्कूल जाने से पहले धीरे से मेरे पास आई और कहा प्लीज़ आना जरुर ,उसके जाने के तुरंत बाद मैं भी तैयार होने लगा था  बार-बार आईने के सामने जाकर अपनी सूरत देखता पर भाई की नजरें बचाकर , आज मैंने भी स्कूल मिस कर दिया था | .मैं जल्दी तैयार होकर उसके स्कूल  पहुँच गया गार्ड ने मुझे रोक लिया था क्यूँकि वह एक गर्ल्स कॉलेज था  तभी मैंने देखा वह दौड़ती हुई आई शायद बेसब्री से मेरा ही इंतजार कर रही थी उसने गार्ड से कहा मेरे साथ हैं मैंने इन्हें बुलाया है ,पहली बार जब मैंने उसके मुंह से दोस्त शब्द सुना मेरा मन मयूर नाच उठा दिल बल्लियों उछलने  लगा था |मैं स्टेज  के सामने सबसे आगे बैठ गया तभी सरस्वती की झांकी में वह सफ़ेद साड़ी में में लपटी मुझे ज़माने की सबसे खुबसूरत परी लग रही थी मैं एकटक अवाक् सा उसे देखे जा रहा  था उसने मुझे देखकर हल्का मुस्करा भर दिया मानो मैं होश में न रह सका |कुछ ही देर बाद दूसरे डांस प्रोग्राम में वह लाल रंग का लहंगा चुनरी पहने थी वह ग्रुप लीडर के रूप में नाच रही थी पता  नहीं कब मैं खड़ा होकर तालियाँ बजने लगा सब मेरी तरफ आश्चर्य से देखे जा रहे थे मै बेखबर मंत्रमुग्ध तालियाँ बजाता रहा उसकी टीचर ने जब मेरे पास आकर बैठने को कहा तो मुझ पर घड़ों  सा पानी फिर गया था मै चुपचाप बैठ गया था पर उसे देखे जा रहा था |  आज भी मुझे वह गाना याद आता है तो मेरी आँखों के सामने वह मनोरम सा दृश्य घूम जाता है मन प्रफुल्लित हो जाता है ,उस देहाती गाने के बोल मुझे आज भी याद हैं 'अपन देखि कै खलिहन्वा मोरा जियरा जुडाय ' |आज भी वह गाना मेरे दिल में आग सा लगा देता है | जैसे ही कार्यक्रम संपन्न हुआ वह मेरे पास आई और पूछने लगी कैसा लगा ? मैंने खुश होकर उसे ढेरों बधाइयाँ दी ,वह आज इतनी सुन्दर लग रही थी मै उसे देख नहीं पा रहा था उसने कहा चलो घर चलें |मैंने उससे कहा यार लिपस्टिक पोंछ डालो तुम इतनी सुन्दर लग रही हो कि मुझे मुझे साथ चलने में शर्म लग रही है
उसके बाद हम अधिकतम समय साथ-साथ बिताते और चुपके से वह मुझे कुछ न कुछ खिलाती रहती फिर भी हम दोनों एक दूसरे को कभी प्रपोज नहीं कर पाए | एक दिन मैंने सारी हिम्मत जुटाकर अपने प्यार का इज़हार कर ही दिया ,वह वहां से भाग खड़ी हुई और मुझसे दो दिनों तक बात नहीं की | मुझे लगा वह नाराज हो गयी है कहीं मेरे भाई से न कह दे , मैंने सारे भगवानों से प्रार्थना की और मन्नतें भी मांगी गोंड प्लीज़ हेल्प मी  |दो दिन बाद उसने भी अपने प्यार का इज़हार कर दिया मैं तो फूला नहीं समा रहा था | धीरे-धीरे हम दोनों एक दूजे की जान हो गए हम रोज छुप-छुपकर मिलते रहते शायद उसके छोटे भाई को शक था इसलिए वह निगरानी किये रहता था |उसकी अनुपस्थिति का फायदा उठाकर हम उससे मिलते ,बातें करते और मैं उसकी गोद में सर रखकर लेता रहता वह मेरे बालों में उँगलियों से कंघी करती जाती और हम दोनों अपने सतरंगी सपनों में खोये रहते |हमारा प्रेम एक पवित्र प्रेम था  ज़माने की हवा जैसी आजकल चल रही है  शायद नहीं लगी थी हमने कभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया था जिससे हम समाज और खुद की नजरों में गिर जाते |हमदोनो का एक दुसरे के सामने होना ही अपार सुख का अनुभव कराता था | वह मेरे जीवन का पहला प्यार और सुखद एहसास था  ,हमारे मिलन का सिलसिला यूँ  ही लगातार चलता रहा कभी हम रुठते तो कभी वह ,ऐसा करते - करते पता नहीं कब १८ महीने व्यतीत  हो गए कुछ पता नहीं चला |
मेरी  बोर्ड परीक्षा   शुरू हो गयी थी मेरा अधिकतम समय पढाई में ही लगता फिर भी हम समय निकल कर मिल लेते थे | परीक्षा होने के बाद वह क्षण आ गया जिसे मैं नहीं आने देना चाहता था ,पापा का सन्देश आया की राजन को  घर भेज दो छुट्टियों में यहीं रह लेगा | मैंने बुझे मन से अलख से विदा ली और जल्दी आने का वादा करके चल पड़ा ,मन उदास  आँखें नम और दिल में अथाह पीड़ा थी |गाँव में अच्छा नहीं लग रहा था पुराने दोस्तों के साथ खेलता कूदता रहता की शायद मन बहल जाये अक्सर उसको याद करके मेरा मन बेचैन रहता | आखिर वह समय आ गया जब मुझे लखनऊ जाना था मैं जल्दी से तैयार हुआ दोस्तों और घर वालों से बिदा लेकर निकल पड़ा |मैं बस में बैठा आँखों में अलख की लिए उसकी यादों को समेटे जल्दी-जल्दी लखनऊ पहुंचना चाहता था | मैं इंतजार करता हुआ पहुँच ही गया जैसे जैसे मै करीब आता जा रहा था मेरा दिल बल्लियों उछलता जा रहा था ,ख़ुशी-ख़ुशी मैं जीने चढ़ने लगा मेरे कान उसकी कोयल जैसी जैसी आवाज सुनने को बेताब थे और आँखें जल्दी से उसे देखना चाहती थीं |मैंने धीरे से मेन गेट धकेला  मैं उसे सरप्राइज देना चाहता था लेकिन जैसे ही ही मैंने अलख के फ़्लैट की तरफ देखा मेरे पैरों से जमीं खिसक गयी मुझे चक्कर सा आने लगा कारण कि उसके दरवाजे में ताला पड़ा था मेरी समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करूँ ? मैं बुझे मन से अपने फ़्लैट में गया भाई से पूछा सामने वाले अंकल कहाँ  गए उन्होंने बताया कि उनके छोटे लड़के ने मोहल्ले में मारपीट कि थी जिससे ज्यादा विवाद हो गया था वे रात में ही सामान लेकर चले गए थे और बताया पता नहीं कहा गए हैं वो लोग |मैंने अलख के पापा और भाई को वे जिस दुकान पर काम करते थे पता लगाया वे लोग भी कई दिनों से दुकान पर नहीं गए थे ,स्कूल  में पता लगाया जिसमे अलख और उसके भाई पढ़ते थे  कोई पता नहीं चल सका ,कई बार स्कूल गया पता चला उनका नाम सूची रजिस्टर से कट गया था | मेरे मिलने कि आस लगातार धूमिल होती जा रही थी  और मैं बेचैन रोता उसकी यादों में खोया रहता ,मेरी पढाई भी ठीक से  नहीं हो पा रही थी लगातार स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था मेरा | भाई ने इलाज भी करवाया पर कोई खास असर नहीं हुआ ,मैं वापस गाँव भेज दिया गया माँ के पास लेकिन मेरा तो जैसे सब लुट ही चुका था | गाँव में मेरे दोस्तों ने बहुत समझाने  की कोशिश की पर मुझे कोई भी रंग रास नहीं आ रहा था मेरे हालत में थोडा सुधार हो गया था  मैं वापस लखनऊ भेज दिया गया मेरी क्लास मिस हो रही थी |
लखनऊ आकर सारा लखनऊ छानता रहा की शायद वो या उसके घर का कोई भी सदस्य मुझे मिल जाये पर कुछ भी पता न चल सका , मुझे जहाँ भी पता चलता ये मकान किराये पर है जाकर पता लगता नतीजा वही शून्य | मैं वर्षों उसका इंतजार करता रहा शायद किसी मोड़ पर मिल जाये पर ऐसा आज तक न हो सका पता  नहीं क्या हुआ कहाँ चले गए वो लोग ?
अब तक शायद उसकी शादी भी हो गयी होगी और ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत कर रही होगी लेकिन उसे कभी न कभी मेरी याद जरुर आती होगी आज भी जब वह मुझे याद आती है मेरा मन विचलित सा हो जाता है उसकी  वही शरारती तस्वीर मेरी आँखों में घूम जाती है  मुझे लगता है कि शायद उससे कहीं मुलाकात हो जाये मैं उससे जीवन में एक बार मिलना जरुर चाहूँगा |
 मेरे मन में लखनऊ के प्रति नफरत सी हो गयी है आज भी लखनऊ शहर में मेरा दम घुटता है ,बिना किसी आवश्यक काम के मै आज भी १ घंटे भी न रुक पता हूँ खासकर पुराने लखनऊ में |
समझ में नहीं आता ये किसने लिखा है और कितना सत्य है ...
छोटी सी दुनिया पहचाने रास्ते हैं कभी तो मिलोगे पूछेंगे हाल .    

cricket ka bhagwan

सचिन तुस्सी ग्रेट हो तुमने  साबित कर दिया और लगातार करते आ रहे हो कि वर्ल्ड क्रिकेट में कोई भी तुम जैसा नहीं है | लगभग सारे रिकॉर्ड तुम्हारे ही नाम हैं जो बचे हैं लगता है जल्द ही वो सब तुम्हारे झोली में होंगे | अबकी वर्ल्ड कप जीतकर आप अपनी महानता  में एक और कोहिनूर जड़ दो | विश्व स्तर पर पचासा लगाना ही बहुत पर तुमने शतकों का पचासा लगाकर अपनी महानता का ऐसा झंडा गाडा है कि शायद ही कोई वहां पर पहुँच पाए |हम सब भारतवासियों की शुभकामनायें तुम्हारे  साथ हैं |

Sunday, December 12, 2010

sachin tujhe salam

सचिन तेंदुलकर ने एक बार नहीं कई बार साबित किया है वो क्यूँ महान है | वो विश्व के महान खिलाडी होने के साथ समकालिक नायक भी है ,कोई सचिन से पूछे जब भारत  ही नहीं विश्व के सफल क्रिकेटर फिक्सिंग में मजे ले रहे थे वो क्यूँ नहीं इस नदी में कूदे ,शायद सचिन ही बता सकें ? आज जब भारत में लगातार आये दिन एक नया नाम भ्रस्टाचार में सामने आ रहा है , हर कोई पैसे के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगाने पर तुला है चाहे वो राजनेता,खिलाडी ,समाजसेवी , या जिनके कन्धों पर देश कि जिम्मेदारी क्यूँ हो | आजकल तो वही सत्य लगता है ...' भ्रस्टाचार कि लूट में लूट सके तो लूट ,अंत समय पछतायेगा जब कुर्सी जाएगी छूट,' |
सचिन जैसे लोगों के कारण ही आज भी लोग थोडा ही सही पर इमानदारी पर विश्वास करते हैं | उसने दिखा दिया वो महान इसलिए है इसीकारण  वो दिलों पर राज करता है | जो उसने शराब कंपनी का  अब तक का सबसे महंगा आफर वापस कर दिया | अरे विज्ञापन वाले भाइयों आप गलत जगह गए आपको तो किसी नेता या समाजसेवी के पास जाना चाहिए था ,काम हो जाता वो भी काम पैसों में |
सचिन तुस्सी ग्रेट हो भाई हम सबको गर्व है तुम पर भगवान तुम्हारी रक्षा करें |

Saturday, December 11, 2010

meri pratham bus yaatra

तब मैं  मुश्किल से १२ वर्ष का था ,जब मेरी बूआजीके सुपुत्र भाभी के साथ गाँव आये थे | हम  सब उन्हें प्यार से लखनऊ वाले दादा कहकर बुलाते थे |वह लखनऊ में एक प्राइवेट फर्म में काम करते थे |मैंने उनसे कई बार पूछा,दादा लखनऊ  कितना  बड़ा है कैसा लगता है क्या क्या होता है ?आदि तमाम प्रश्न पूछकर अपनी सारी  जिज्ञासायें शांत की |
तब मेरे गाँव में लाइट नहीं आती थी  सड़क व्यवस्था  भी सही नहीं थी |जहाँ से लखनऊ के लिए बसें मिलती थीं वह बस अड्डा हमारे  गाँव से १ मील दूर था ,जिसे हम चाहकर भी कभी देख न सके |मेरे गुरूजी ने भी शहरों के बारे में खूब बताया था कि वहां खूब मोटर गाड़ियाँ चलती हैं और बहुत ऊँची ऊँची इमारतें हैं और बहुत अच्छा लगता है |
मैंने दादा से जिद की मुझे भी साथ ले चलो ,मम्मी-पापा से भी प्रार्थना की  मुझे भी  भेज दो |पापा की सहमति मिलने से मैं फूला नहीं समां रहा था और दौड़- दौड़ कर अपने सारे दोस्तों बताता कि मैं कल लखनऊ जाऊंगा वह भी उस बस से जो बहुत जोरसे दौड़ती है बहुत तेज तेज होर्न बजाती है ...
इतवार  को  जाना था शनिवार कि रात मैं ठीक से सो नहीं सका  था सुबह जल्दी तैयार होने लगा था | मेरे मन में लड्डू फूट रहे थे आज मै उस बस में बैठने वाला था जिसके बारे में अभी तक केवल मैंने सुना था ,अजीब सी गुदगुदी हो रही थी |मैं दादा से बार -बार कह रहा था जल्दी चलो जल्दी ,सारे लोग मेरी गतिविधियाँ देख कर खुश हुए जा रहे थे
पापा हम लोग को बैलगाड़ी से बस अड्डे तक पहुँचाने आये थे |जाते समय मैं खुद को दुनिया का सबसे भाग्यशाली  महसूस कर रहा था |वहां पहुंचकर देखा बस नहीं थी मैं बहुत निराश था पूँछा तो पता चला कि १० मिनट बाद आएगी व्याकुलता से मैं उसका इंतजार किये जा रहा था | आखिर वहां एक होर्न बजाती हुई बस आई जिसकी तरफ मैं अपलक देखे जा रहा था |मैं उसकी तरफ चढ़ने के लिए भागा पापा ने पकड़ लिया और कहा रुकने तो दो यार !पापा से विदा लेकर मैं बस पर चढ़ गया और सारी बस में उछलता हुआ  निरीक्षण करने लगा था  |कई यात्री बैठे थे और कुछ आ रहे थे | ड्राइविंग सीट पर ड्राइवर बैठ चुका था उसने स्टार्ट करते हुए होर्न बजाया और चल दिया |मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था एक तो बस से पहली बार यात्रा करने को मिल रही थी दूसरे लखनऊ शहर देखने कि तमन्ना |बस होर्न बजाती हुई चली जा रही थी मैं विस्मय से खिड़की के शीशे से बाहर देखे जा रहा था ,मुझे लग रहा था कि मेरे आस-पास का सारा परिक्षेत्र घूम रहा है बहुत मज़ा आ रहा था |अगले बस स्टॉप पर बस रुकी मैंने पूछा दादा-दादा लखनऊ आ गया उन्होंने कहा नहीं अभी ३ घंटे लगेंगे | मुझे रस्ते में कई बसें और छोटी-छोटी गाड़ियाँ भी मिली पर हमारी बस होर्न बजाती हुई सबको पीछे छोड़ भागी  जा रही थी |अगले बस स्टॉप पर दादा ने पूछा कुछ खाओगे मैंने तुरंत हामी भर दी वो समोसे लेकर आये मैंने दो ले लिए और खाते -खाते चरों तरफ देखे जा रहा था ,भाभी मेरी तरफ देखकर मुस्कराए जा रहीं थी | बस फिर चल पड़ी  धीरे-धीरे शाम होती जा रही थी ,मैं लखनऊ पहुँच रहा था दूर से सड़क के बीच में रोड लाइट का लगना लगातार मेरी कौतूहलता को बढ़ाये जा रहा था |मैंने पूछा दादा यह ऊपर आग क्यूँ जल रही है ?उन्होंने बताया ये लाइट हैं जो सरकार ने लगवाई है |बस अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच कर रुक गयी ,सब लोग नीचे उतरने लगे हमें भी उतरना था पर मेरा मन कर रहा था कि काश हम थोड़ी देर और बैठे रहें |नीचे  उतरकर मैं हैरत से देखे जा रहा था चरों तरफ आवाज़ ही आवाज़ आ रही थी , ऊँची-ऊँची इमारतें बनी थी बहुत सी गाड़ियाँ आ जा रही थीं |हम रिक्शा  में बैठकर घर पहुंचे ,आज मैं बहुत खुश था  बस कि प्रथम यात्रा करके |
वहां के शोर शराबे ने कुछ हद तक मुझे भयभीत कर दिया था ,हर कोई भागा जा रहा था कोई किसी से बात तक नहीं कर रहा था सब-सब अपने-अपने में मस्त भागे जा रहे थे |जो ख़ुशी मुझे बस में  यात्रा करने से मिली थी वह शोर -शराबे में काफी हद तक कम हो गयी थी|
आज भी उस रोमांचित करने वाली बस कि प्रथम यात्रा का स्मरण आते ही मेरा मन प्रफुल्लित  हो जाता है हंसी आ जाती है अपने बचपन के दिनों को याद करके |  

Wednesday, November 24, 2010

janta ki lalkar

बिहार  में जो चुनाव हुआ और जो रिजल्ट आया दिल को सुकून देने वाला है |अभी तक बिहार के पिछड़ने का कारण वहा के नेताओं का स्वार्थ था ,अभी तक किसी ने भी जनता की नहीं सुनी आखिर कब तक जनता लालू को झेलती |लालू को भी लल्लू बनाकर छोड़ा मजा आ गया ,जिस तरह से लालू और पासवान का पूरा जातिवादी परिवार बुरी तरह हारा है सभी नेताओं को सचेत हो जाना चाहिए | अब हर कोई विकास चाहता है  सिर्फ विकास | कब तक उसे इस्तेमाल  करोगे ? आज केवल बिहार ही नहीं उत्तरप्रदेश समेत कई राज्यों में बदलाव की जरुरत है जहाँ लोग जाति और धर्म के नाम पर जनता को बरगलाते हैं|  जागो वोटरों जागो निकाल फेंको इन सत्ता के लालची भेड़ियों को |
नितीश को ज्यादा खुश होने की जरुरत नहीं है ,लोगों ने बड़ी उम्मीद के साथ उनको चुना है उन्हें उसे ध्यान में रखना है जो वादे किये हैं उन्हें पूरा करना है वर्ना लालू जैसी हालत हो जाएगी की विपक्ष में भी बैठने के लायक नहीं बचोगे |
आज हमारे देश को एक कुशल नेतृत्व  की जरुरत है जो जाति, धर्म आदि से परे हो ,जिसका उद्देश्य देश को सम्रद्ध बनाना हो न की अपनी बैंकों को भरना हो | जो देश को गरीबी और भ्रस्टाचार से निजात दिलाये न कि हर एक दिन नए घोटाले करे |

Thursday, November 18, 2010

great political leader

हमारे देश के नेताओं ने अपना और अपने देश का नाम रोशन कर दिया है | जैसा सपना बापू  ने देखा था और उन लोगों ने देखा था जिन्होंने अपना सब कुछ यहाँ तक कि अपनी जान तक हँसते- हँसते दे दी थी | उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा ,हम देश की जिम्मेदारी का भार  पर जिन पर डाले जा रहे हैं वो खुद अपनी जिम्मेदारी देश पर डालकर देश को लुटे जा रहे हैं | अगर शायद भ्रष्ट  नेता न होते तो हम भी विकसित देशों की लाइन में होते हम भी एक महाशक्ति होते |
हमारे देश में लगभग ८०% नेता, ही भ्रष्ट है जिस प्रकार आये दिन एक नया नाम खुलता जा रहा है लगता है कि बचे २०% अपनी बारी का इंतजार  कर रहे हैं | जब हमारे पालनहारों का यह हाल है तो आम नागरिक से उम्मीदे लगाना भी बेमानी है |
अगर आज इनका विदेशों  में जमा पैसा भारतीय जनता में बाँट  दिया जाये तो बिना कोई काम करे ही हर कोई खाना खा सकेगा ,अगर यह पैसा हम भारत के विकास कार्यों में लगाये  तो हम अमेरिका को भी पीछे कर देंगे ,बशर्ते वहा भी  कई भूखे शेर न आ जाएँ | जिन्हें देश कि इज्जत की बात छोडो,उन्हें डर है की कही वो भ्रस्टाचार में किसी से पीछे न रह जाएँ |
मेरा अपने देश के कर्णधारों से अनुरोध है की देश को खूब लूटो पर हमारी बची भावनाओं को आदर्श सोसाइटी  आदि पवित्र नामो से बदनाम मत करो |
 हमारा देश तरक्की कर रहा है ,कई नए-नए आयाम स्थापित कर रहा है मगर अफ़सोस भ्रस्टाचार में |
अगर इनका बस चलता तो यह देश को ,राज्य एवम जिलो को भी बेच डालते | 
आज हम आम लोग को ध्यान देना होगा की हम उन  लोगो को जो हमारी स्थिति के जिम्मेदार हैं को न चुने और जो धर्म ,जाति के नाम पर देश में अराजकता फैलाते है उन्हें निकाल बाहर फेंके |
आज कोई किसी के खिलाफ कुछ नहीं बोलता क्यूँकि वही कहावत चरितार्थ होती है ,"चोर चोर मौसेरे भाई " |
हे भगवन मेरे देश को बचाओ इन लालची भेड़ियों से ...........
एक डाकू हमारे लिए उतना खतरनाक नहीं है जितना की यह लोग ,डाकू को तो हम जानते हैं कि यह डाकू है पर इनको.........................
आज हमारे पूरे देश को नौकरशाह और नेता  नामक दीमक चाट रहा है हम सबको इससे बचाना है  ..................
 

Tuesday, November 16, 2010

mera pata ?

आज फिर मेरे मन  में आया कि मुझे कुछ लिखना चाहिए ,क्यूँकि सर ने कहा था कि तुम्हे रोज कुछ न कुछ लिखना जरुर है | चाहे कुछ भी हो कितना गलत भले ही  हो मै लिखने कि कोशिश करूँगा | आजकल नवयुवकों को बहरी चमक- दमक बहुत प्रभावित करती है खासकर मीडिया कि दुनिया |
जब पहली बार मैंने अपने दोस्त के कहने पर मीडिया इंस्टिट्यूट में दाखिला लिया तब मैंने जाना | मैं एस कोर्से के बारे में बिलकुल अनभिज्ञ था कि क्या होता है और क्या करना पड़ता है |
मै भी अपनी दुनिया में मस्त हर नवयुवक  कि तरह मन में आगे बढ़ने कि लालसा लिए कुछ हसीं सपने सजाये था | हर उत्तरप्रदेश के नवयुवक कि तरह डिग्री लेमिनेशन करवा के सेफे में रख दिया था क्यूँकि मैंने ऍम. ए किया जरुर था पर मेरे पास उस स्तर का ज्ञान नहीं था |
मैंने पिचले पांच सालों से एल.आइ. सी. में कार्य कर रहा था, मैंने वहां मिले अपने टार्गेट को प्राप्त करता रहा , और अपनी आमदनी से खुश था पर संतुष्ट नहीं था |
पता नहीं कब मेरे मन ने बरसाती मेढक कि तरह करवट बदली और मेरा  मन अशांत रहने लगा |
मेरे मन में भी वो ख्याल हिलोरे भरने लगे मेरा मन भी सोचने लगा जिसे मै भूल चूका था , मैं फिर पढ़ना चाहता था ,तभी बी . एड . के फॉर्म निकले मैंने आव देखा न ताव  भर दिया और पढने लगा | बी.एड . में मेरा सेलेक्शन   हो गया था और मेरे नंबर के आधार पर मेरी रंकिंग १४५ थी ,पर मैंने एडमिशन लेना चाहा लेकिन  नहीं लिया क्यूँकि मैं समाज के लिए कुछ करना चाहता था प्रत्यछ रूप से |      तभी मेरी मुलाकात मेरे एक दोस्त से हुयी जो मीडिया कोर्से करना चाहता था उसने मुझे प्रेरणा दी | मने घर वालों से बिना पूछे  ही एडमिशन करवा लिया क्यूँकि वो नहीं चाहते थे कि अपना जमा -जमाया धंधा छोड़ दूँ | मैंने अपने पापा और माता जी को समझाया ,वो मान गए और आशीर्वाद देकर विदा किया पर भाई नहीं चाहते थे कि मै ऐसा करूँ ,इसका मतलब यह नहीं कि वो मुझे आगे बढ़ता नहीं देखना चाहते थे| वो सब मुझे बहुत प्यार करते हैं मेरी भावनाओं का सम्मान करते हैं , कारण केवल यह था  कि वो नहीं चाहते थे कि मैं उनसे दूर रहूँ | वो चाहते थे कि मैं जो कर रहा  हूँ वही काम करूँ |
मेरा परिवार एक बड़ा एवं संयुक्त परिवार है जैसा कि अब भारत में बहुत कम ही होता है, सरे लोग प्यार से रहकर जिंदगी का आनंद लेते हैं , मैं अपने भाइयों में सबसे छोटा एवं सबका दुलारा हूँ वो आज भी मेरा बहुत ख्याल करते हैं और मेरी आवश्यकताओं को बिना कहे ही पूरा करते हैं | मैं अपने सुन्दर परिवार से बहुत प्यार करता हूँ | मेरे बड़े भाई जो पी ए सी में हैं और (सारे भाई कार्यरत  हैं) पूरे परिवार का ख्याल अपने आप से ज्यादा रखते हैं, जो मेरे  आदर्श हैं , मैं भगवन से प्रार्थना करता हूँ कि हर जन्म में उन्हें मेरा भाई बनाये |
मैं भी आँखों में रंगीन सपने लिए अपने दोस्त के साथ अपना  सामान लेकर जहांगीराबाद मीडिया इंस्टिट्यूट पहुँच गया ,वो तारीख २ अक्तूबर २०१० थी जब मैंने अड्मिसन लिया मेरा इंटरव्यू  गौहर सर ने लिया और कहा बेटा बहुत कमजोर हो मेहनत  करो | मैं बीजू सर जो कि डिप्टी डायरेक्टर है से बहुत प्रभावित हुवा,शाम के ४ बजे थे बीजू सर ने कहा आज सबको कुछ पौधे लगाने है जमीं बहुत कसी थी , मैंने सोचा इतनी मेहनत करनी पड़ेगी ? पर जब मेरे सारे सहपाठी  और बीजू सर , गौहर सर सबने  मेहनत किया और महात्मा गाँधी क़ी याद में पौधे लगाये | सचमुच मजा आ गया, आज जब भी मै उस दिन को याद करता हूँ अपनी सोच पर हसीं सी आ जाती हैं |
मैंने सोचा था घर से दूर रहकर कैसा लगेगा कैसे लोग होंगे ? सच कहूँ तो मुझे कभी अहसास ही नहीं हुवा |मैंने सोचा भी न था क़ी ऐसे प्यारे दोस्त और बड़े भाई क़ी तरह अध्यापक होंगे |
अब मुझे कहने में कोई दिक्कत नहीं कि अब मुझे छुट्टी में घर जाना भी अच्छा नहीं लगता |
अब मैं बहुत खुश हूँ और अपनी मंजिल तक जाने के लिए प्रयासरत हूँ  |
      

Monday, November 15, 2010

क्या लिखूं मेरी कुछ भी समझ में नहीं आता है,शायद मुझे नहीं पता कि मैंने भी कभी भी   सोचा होगा कि मैं भी कुछ लिख सकता हूँ |जब भी कभी स्कूल में  मुझे निबंध  लिखने को कहा जाता था मै सहपाठियों से सहायता की आस लगा लेता था  | पर आज जब क्लास में सर ने कहा तुम्हे कुछ भी लिखना है मै परेशां हो उठा,सर ने मेरी भावनाओं को समझा और हम सबको एक टास्क दिया| जिसे हमने डरते- डरते किया | उत्तर गलत होते हुए भी सर ने प्रशंशा की और कहा ' U CAN    DO IT  '
फिर क्या मेरे भी मन में हलचल हुयी और लगा मुझे भी लिखना चाहिए |
किस टोपिक पर लिखूं यह तो अभी तक समझ में नहीं आया, मैंने सोचा कुछ अपने ही बारे में लिख डालूं पर  क्या ? मैं कौन हूँ और मेरा लक्ष्य क्या है सोचा तो होश उड़ गए , मेरे पास कोई भी सटीक जवाब नहीं है
सच कहूँ तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे अपने ही बारे में नहीं मालूम  होगा, मैं अपने ही बारे में इतना लाचार होऊंगा | मैंने हमेशा दूसरों के बारे सोचा कि वो ऐसा है या उसे वैसा  होना चाहिए पर कभी भी अपने बारे में नहीं सोंचा | लेकिन लगता है आज सोचना ही पड़ेगा पर क्या  ? सर कृपया  मेरा मार्गदर्शन कीजिये लिखने से पहले अपने बारे में क्या सोचूं ,मेरा दिमाग एकदम  कुंद हो गया  है |आज मुझे पता चला कि एक लेखक क्या होता है ,कितना बहादुर  होता है ?   
आज मै अपने बारे में कुछ भी नहीं लिख पा रहा हूँ कितना बेबस और कितना लाचार हूँ मै |
    क्या करूँ क्या लिखूं अपने बारे में ? अब मै नहीं लिख सकता लेकिन विश्वाश दिलाता  हूँ एक दिन अपने बारे जब जान जाऊंगा तो जरुर लिखूंगा, लेकिन पहले अपने बारे में सोचूंगा  खुद को जानूंगा पहचानूँगा  और लिखने लायक हो जाऊंगा |
  belive me I CAN DO  IT >>>>   
मेरा नाम हरी ओम है